दिल्ली हादसा: अफसर-डॉक्टर बनने के सपने मलबे में दफन

सपनों का मलबा, उजड़ीं कई जिंदगियां: वैज्ञानिक, अफसर, डॉक्टर बनने आए थे दिल्ली, इमारत ढहने से सब खत्म
हिंदी टीवी न्यूज, नई दिल्ली । Published by: Megha Jain Updated Mon, 01 Jun 2026
दक्षिणी दिल्ली के सैदुल्लाजाब स्थित निर्माणाधीन सात मंजिला इमारत ढहने के मामले में अब तक छह लोगों की मौत हो चुकी है। हादसे के दूसरे दिन रविवार देर रात तक राहत एवं बचाव अभियान जारी रहा।
दक्षिण दिल्ली के सैदुल्लाजाब में शनिवार रात ढही सात मंजिला इमारत के मलबे में सिर्फ ईंट, सीमेंट और सरिए नहीं दबे थे, बल्कि उन हजारों सपनों की कहानियां भी दफन हो गई, जिन्हें छोटे शहरों और गांवों से आए युवाओं तथा उनके परिवारों ने वर्षों की मेहनत, त्याग और संघर्ष से सींचा था।
किसी पिता ने बेटी को डॉक्टर बनाने के लिए जमीन बेच दी थी तो किसी मां-बाप ने बेटे को अधिकारी बनाने की उम्मीद में कर्ज लिया था। कोई बेहतर भविष्य की तलाश में अपना घरबार छोड़कर दिल्ली आया था। लेकिन एक झटके में इमारात के साथ उनके सपने भी जमींदोज हो गए। हादसे ने कई परिवारों की दुनिया उजाड़ दी। अलवर की एकता, बिहार के नवादा के नलिन और नेपाल की पार्वती जैसे नाम अब केवल हादसे के आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन अधूरे सपनों और बिखरे अरमानों की पहचान बन गए हैं जिन्हें यह त्रासदी हमेशा के लिए अपने साथ ले गई।
इंटरव्यू की खुशी मातम में बदली
थम गया नलिन का अफसर बनने का सफर
खेत बेचकर बेटी को पढ़ाया, लेकिन किस्मत ने सब छीन लिया
एफएमजीई से पहले टूट गया डॉक्टर बनने का सपना
उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के तरबगंज निवासी 26 वर्षीय रवि उन हजारों विदेशी मेडिकल स्नातकों में शामिल थे,, जो डॉक्टर बनने का सपना लेकर संघर्ष कर रहे थे। किर्गिस्तान की जलाल-अबाद स्टेट यूनिवर्सिटी से एमबीबीएस करने वाले रवि की पढ़ाई पर परिवार ने करीब 30 लाख रुपये खर्च किए थे, जिसके लिए कर्ज भी लेना पड़ा। अगस्त 2024 में भारत लौटने के बाद वह 28 जून को होने वाली एफएमजीई परीक्षा की तैयारी में जुट गए थे।
पहले प्रयास में असफल रहने के बाद रवि ने पूरी मेहनत के साथ दोबारा तैयारी शुरू की थी। दोस्तों के अनुसार वह रोज देर रात तक पढ़ाई करता था और परिवार पर चढ़े कर्ज को लेकर भी चिंतित रहता था। उसके पिता किसान हैं और परिवार को उम्मीद थी कि रवि डॉक्टर बनकर उनकी आर्थिक स्थिति बदलेगा। लेकिन सैदुल्लाजाब हादसे ने यह सपना अधूरा छोड़ दिया। परीक्षा से पहले ही रवि की मौत ने परिवार की उम्मीदों और वर्षों के संघर्ष को मलबे में दफन कर दिया।
छात्रों के लिए मां जैसा सहारा थीं पार्वती
नेपाल के धनगढ़ी से दिल्ली आईं पार्वती ने बेहतर भविष्य की तलाश में एक छोटी सी कैंटीन शुरू की थी। धीरे-धीरे यह कैंटीन आसपास रहने वाले छात्रों का दूसरा घर बन गई। वह छात्रों की पसंद-नापसंद का ख्याल रखती थीं। बीमार होने पर दवा लेने की सलाह देतीं और समय पर खाना खाने की याद भी दिलाती थीं। उनका सपना था कि एक दिन इस छोटी कैंटीन को बड़े होटल में बदलें और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करें। लेकिन इमारत गिरने के बाद गंभीर रूप से घायल पार्वती को बचाया नहीं जा सका। उनके साथ वह सपना भी खत्म हो गया जिसे वह मेहनत और उम्मीदों के सहारे आकार दे रही थीं।















