Himachal: हाईकोर्ट की सख्ती: कानून तोड़ने वालों की नौकरी नहीं

हिमाचल: कानून के रक्षक ही उल्लंघन करने लगें तो उन्हें सेवा में बनाए रखना उचित नहीं, जानें हाईकोर्ट के फैसले
हिंदी टीवी न्यूज, शिमला। Published by: Megha Jain Updated Fri, 31 Jul 2026

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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एनडीपीएस अधिनियम के तहत दोषी ठहराए गए पुलिस के दो कांस्टेबलों की बर्खास्तगी के खिलाफ दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के रक्षक ही जब कानून का उल्लंघन करने लगें, तो उन्हें सेवा में बनाए रखना उचित नहीं है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मामले में दोषी पुलिस के कर्मचारी (कांस्टेबल) हैं, जिन्हें एनडीपीएस अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया है। जिन पर एनडीपीएस मामलों की जांच करने और दोषियों को सजा दिलाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी, वे खुद इन अपराधों में लिप्त पाए गए हैं। ऐसी स्थिति में बर्खास्तगी की सजा को किसी भी तरह से अत्यधिक या असंगत नहीं कहा जा सकता।
अदालत ने पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की ओर से संविधान के अनुच्छेद 311(2)(ए) के तहत बिना विभागीय जांच के की गई बर्खास्तगी की कार्रवाई को पूरी तरह से वैध ठहराया है। यह संयुक्त निर्णय न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता गौरव वर्मा और अक्षय चौहान की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया।
गौरतलब है कि पहले मामले में याचिकाकर्ता वर्ष 2009 में कांस्टेबल नियुक्त हुए। 2016 में थाना बल्ह (मंडी) में 1,003 ग्राम चरस की बरामदगी के आरोप में एनडीपीएस एक्ट की धारा 20 के तहत मामला दर्ज हुआ। ट्रायल कोर्ट स्पेशल जज, मंडी ने दोषी ठहराते हुए 3 साल की सजा और 25,000 का जुर्माना सुनाया। एक अन्य मामले में याचिकाकर्ता वर्ष 2015 में खेल कोटे के तहत कांस्टेबल नियुक्त हुआ। 2019 में थाना भुंतर में एनडीपीएस एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज हुई। ट्रायल कोर्ट (स्पेशल जज-II, रामपुर बुशहर) ने 26 दिसंबर 2023 को उसे दोषी ठहराया। दोनों याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि हाईकोर्ट में आपराधिक अपील लंबित है और उनकी सजा निलंबित कर दी गई है। तर्क दिया कि डीजीपी अनुशासनात्मक प्राधिकरण नहीं हैं।
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि संविधान का अनुच्छेद 311(2)(ए) सक्षम प्राधिकारी को आपराधिक मामले में सजा मिलने पर बिना जांच के बर्खास्त करने का अधिकार देता है। सजा का निलंबन केवल जेल जाने पर रोक लगाता है, इससे दोषसिद्धि खत्म या स्थगित नहीं होती। अदालत ने माना कि हाईकोर्ट की ओर से आपराधिक अपील में केवल सजा का निलंबन किया गया था, दोषसिद्धि पर रोक नहीं लगाई गई थी। जब तक अपीलीय अदालत दोषसिद्धि को रद्द नहीं कर देती, तब तक बर्खास्तगी का आदेश पूरी तरह से वैध रहता है।
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