Himachal: पीटीए शिक्षकों को झटका: शुरुआती सेवा पेंशन-वरिष्ठता में नहीं जुड़ेगी

Himachal: पेंशन और वरिष्ठता में नहीं जुड़ेगी पीटीए शिक्षकों की प्रारंभिक सेवाएं, जानें हाईकोर्ट के बड़े फैसले
हिंदी टीवीन्यूज, शिमला। Published by: Megha Jain Updated Fri, 24 Jul 2026
अदालत ने स्पष्ट किया कि पीटीए के तहत की गई प्रारंभिक सेवा अवधि को पेंशन, वरिष्ठता, वेतन वृद्धि या अन्य वित्तीय लाभों के लिए नहीं जोड़ा जा सकता। न्यायालय ने कहा कि पीटीए शिक्षक सीधे राज्य सरकार के कर्मचारी नहीं थे, इसलिए उनकी प्रारंभिक सेवा को सरकारी सेवा के समान नहीं माना जा सकता।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पीटीए के माध्यम से नियुक्त शिक्षकों को झटका देते हुए उनकी 62 याचिकाएं खारिज कर दी हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि पीटीए के तहत की गई प्रारंभिक सेवा अवधि को पेंशन, वरिष्ठता, वेतन वृद्धि या अन्य वित्तीय लाभों के लिए नहीं जोड़ा जा सकता। न्यायालय ने कहा कि पीटीए शिक्षक सीधे राज्य सरकार के कर्मचारी नहीं थे, इसलिए उनकी प्रारंभिक सेवा को सरकारी सेवा के समान नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने प्रवीण कुमार व अन्य की याचिकाओं पर संयुक्त फैसला सुनाते हुए कहा कि पीटीए शिक्षकों की नियुक्ति शिक्षा विभाग के सक्षम प्राधिकारी की ओर से नहीं, बल्कि स्कूल स्तर की पीटीए समितियों ने स्थानीय आवश्यकता के आधार पर की थी। इन शिक्षकों को सरकार सीधे वेतन नहीं देती थी, बल्कि पीटीए समितियां मानदेय देती थीं, जिसकी प्रतिपूर्ति सरकार ग्रांट-इन-एड नीति के तहत करती थी।
याचिकाकर्ताओं ने विद्या उपासकों से जुड़े जोगा सिंह मामले का हवाला देते हुए अपनी प्रारंभिक सेवा को जोड़ने की मांग की थी। अदालत ने इसे अस्वीकार करते हुए कहा कि विद्या उपासकों की नियुक्ति सरकार की ओर से निर्धारित चयन प्रक्रिया और न्यूनतम योग्यता के आधार पर हुई थी, जबकि पीटीए शिक्षकों की नियुक्ति भर्ती एवं पदोन्नति नियमों का पालन किए बिना स्थानीय स्तर पर की गई थी। दोनों मामलों की परिस्थितियां समान नहीं हैं, इसलिए जोगा सिंह फैसले का लाभ पीटीए शिक्षकों को नहीं मिल सकता। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2021 में नियमितीकरण की मांग वाली याचिका दायर की थी, जिसके बाद उन्हें 1 दिसंबर 2023 से नियमितीकरण का लाभ मिल चुका है। उस समय उन्होंने प्रारंभिक पीटीए सेवा (2005-2007) को जोड़ने का दावा नहीं किया था। इसलिए अब उस अवधि को पेंशन, वरिष्ठता या अन्य वित्तीय लाभों के लिए जोड़ने का कोई आधार नहीं बनता।
हाईकोर्ट ने अटल यूनिवर्सिटी को दिए 25 जुलाई को काउंसिलिंग कराने के निर्देश
प्रदेश हाईकोर्ट ने जॉब ट्रेनी और सीनियर रेजीडेंसी से जुड़े एक मामले में याचिकाकर्ता को राहत देते हुए अटल मेडिकल एवं रिसर्च यूनिवर्सिटी और राज्य सरकार को परिणाम घोषित करने तथा काउंसिलिंग आयोजित करने का निर्देश दिया है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने प्रतिवादी यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता का परिणाम घोषित कर 25 जुलाई को काउंसिलिंग आयोजित की जाए। इसके तुरंत बाद, रिक्त पदों की उपलब्धता और कोर्ट के अंतिम आदेशों के अधीन, याचिकाकर्ताओं की पसंद के अनुसार पोस्टिंग ऑर्डर जारी किए जाएं। अदालत ने स्पष्ट किया कि सीनियर रेजीडेंसी पूरा करने के बाद याचिकाकर्ता के जॉब ट्रेनी के रूप में बने रहने के अधिकार पर इस नियुक्ति से कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। बता दें कि अदालत ने राज्य सरकार द्वारा काउंसिलिंग प्रक्रिया में शामिल होने के लिए पूर्व अनुमति की पूर्व शर्त थोपने को प्रथम दृष्टया अनावश्यक और अनुचित पाया है। अदालत के कड़े रुख के बाद, राज्य सरकार और संबंधित प्रतिवादियों को जारी काउंसिलिंग की प्रक्रिया में आगे बढ़ने से तुरंत रोक दी थी।
बंजार नगर पंचायत अध्यक्ष के चुनाव को हाईकोर्ट में चुनौती, नोटिस जारी
कुल्लू जिले की बंजार नगर पंचायत के अध्यक्ष पद पर चुनाव और आरक्षण रोस्टर के क्रियान्वयन को लेकर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते राज्य सरकार सहित प्रतिवादी धनवंती देवी को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई 9 सितंबर को होगी। याचिकाकर्ता विवेक शर्मा व अन्य की ओर से यह याचिका दायर की गई है। बताया गया है कि सामान्य सीट पर जीती एससी महिला कोटे का लाभ नहीं मिल सकता।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि मई 2026 में हुए चुनावों में वार्ड नंबर 6 (अपर शेगलू) से प्रतिवादी धनवंती देवी ने अपना नामांकन दाखिल किया था और वह निर्विरोध चुनी गई थी। आरक्षण रोस्टर के तहत नगर पंचायत बंजार के अध्यक्ष का पद अनुसूचित जाति (महिला) श्रेणी के लिए अधिसूचित किया गया था और उसी आधार पर संबंधित प्रतिवादी को अध्यक्ष मनोनीत/चयनित किया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि संबंधित महिला प्रत्याशी सामान्य महिला उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीती थी, न कि अनुसूचित जाति (महिला) उम्मीदवार के रूप में। केवल इस आधार पर कि वह अनुसूचित जाति समुदाय से संबंध रखती हैं, उन्हें अध्यक्ष पद के लिए निर्धारित एससी (महिला) आरक्षण रोस्टर का लाभ नहीं दिया जा सकता।
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