शिमला: पॉक्सो के दो आरोपी बरी, नाबालिग के मुकरने और सबूतों की कमी से मिली राहत

शिमला: पॉक्सो के दो मामलों में आरोपियों को राहत, नाबालिग के बयान से मुकरने और साक्ष्यों की कमी पर हुए बरी
हिंदी टीवी न्यूज, शिमला। Published by: Megha Jain Updated Thu, 10 Sep 2026
शिमला की फास्ट ट्रैक विशेष अदालत ने पॉक्सो से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में आरोपियों को बरी कर दिया। पहले मामले में ठियोग निवासी राहुल पर नाबालिग को बहला-फुसलाकर ले जाने और दुष्कर्म का आरोप था। सुनवाई के दौरान पीड़िता और उसकी मां अपने बयानों से मुकर गईं।
राजधानी शिमला की फास्ट ट्रैक विशेष अदालत (रेप/पॉक्सो) ने पॉक्सो एक्ट से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में आरोपियों को बरी कर दिया। दोनों मामलों में अदालत के सामने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों को लेकर अहम सवाल सामने आए। एक मामले में पीड़िता और उसकी मां अपने पूर्व बयानों से मुकर गईं, जबकि दूसरे मामले में पीड़िता की उम्र को लेकर ठोस प्रमाण सामने नहीं आ सके। दोनों मामलों में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विवेक शर्मा की अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और बयानों के आधार पर आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया।
दूसरे मामले में फास्ट ट्रैक विशेष अदालत ने आयुष निवासी खरोट, चिड़गांव को पॉक्सो और दुष्कर्म के आरोपों से बरी कर दिया। अभियोजन पक्ष के मुताबिक जनवरी 2026 में एक अस्पताल में युवती के गर्भवती पाए जाने के बाद उसकी उम्र नाबालिग होने के संदेह में चिड़गांव थाने में पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था।
मामले की सुनवाई के दौरान पीड़िता ने अदालत में कहा कि घटना के समय वह बालिग थी और उसने अपनी मर्जी से विवाह किया था। मामले में पेश किए गए दस्तावेजों में भी उम्र को लेकर एकरूपता नहीं थी। स्कूल रिकॉर्ड, पंचायत रिकॉर्ड और आधार कार्ड में दर्ज जन्मतिथि में विरोधाभास सामने आया। अदालत ने पाया कि नाबालिग होने का पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं है। ऐसे में पॉक्सो के तहत आरोप साबित करने के लिए जरूरी उम्र संबंधी तथ्य स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं हो पाए। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और रिकॉर्ड के आधार पर आयुष को भी दोषमुक्त कर दिया।
दोनों मामलों में अदालत के फैसले में साक्ष्यों की विश्वसनीयता और कानूनी प्रक्रिया का पालन महत्वपूर्ण रहा। पहले मामले में पीड़िता के बयान से मुकरने के साथ फॉरेंसिक सैंपल की सील प्रक्रिया पर सवाल उठा, जबकि दूसरे मामले में पीड़िता की उम्र से जुड़े दस्तावेजों में विरोधाभास सामने आया। अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और अभियोजन पक्ष की ओर से पेश साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद दोनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया।















